संघर्ष से सफलता तक: हरेंद्र खंडेल का सफर
हरेंद्र गांधीपुरा में बाल श्रम और पारिवारिक कठिनाइयों से उबरकर खेती, उद्यमिता और सामुदायिक नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़े हैं।
हरेंद्र की कहानी न केवल कठिनाइयों की है, बल्कि लचीलेपन, आशा और एक युवा सहरिया आदिवासी लड़के की अटूट भावना की भी है जिसने अपने दृढ़ संकल्प से अपना भाग्य बदल दिया।
ग्वालियर के पास गांधीपुरा के छोटे से देहाती गाँव में जन्मे, हरेंद्र अपने माता-पिता, जो दैनिक वेतन भोगी खेतिहर मजदूर थे, और अपने छोटे भाई, भूरा के साथ एक मिट्टी के घर में पले-बढ़े। हालाँकि जीवन कठिन था, लेकिन परिवार के घनिष्ठ संबंध ने उन्हें मजबूत बनाए रखा। उन्होंने सरकारी स्कूल से अपनी शिक्षा शुरू की, जहाँ वे केवल एक हाफ पैंट पहनकर जाते थे, और मिड-डे मील में मिलने वाले दलिये के लिए घर से एक कटोरा साथ ले जाते थे।
शुरुआती संघर्ष और पारिवारिक जिम्मेदारी
साल 2009 में, जब हरेंद्र 13 वर्ष के थे, तब उनके पिता को तपेदिक (टीबी) का पता चला था। इसके बाद हरेंद्र ने पारिवारिक जिम्मेदारियाँ संभालीं, कृषि क्षेत्र में अंशकालिक (पार्ट-टाइम) काम किया, 30 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर मटर तोड़ी, फिर 120 रुपये प्रतिदिन पर सरसों की कटाई की और साथ ही रात में पढ़ाई भी जारी रखी। बिगड़ती परिस्थितियों के बावजूद वे साल 2012 तक 10वीं कक्षा में पहुँच गए।
साल 2017 में उनके पिता का देहांत हो गया। मैट्रिक (10वीं) के बाद हरेंद्र को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वे ग्वालियर आ गए, जहाँ वे एक निर्माण स्थल पर प्रतिदिन 170 रुपये की मजदूरी पर रेत, बजरी और सीमेंट ढोने का 13 घंटे का काम करते थे। व्यक्तिगत बलिदानों के बावजूद, उन्होंने अपने भाई की शिक्षा जारी रखना सुनिश्चित किया, जिसने बाद में बी.एससी. पूरी की और अब वह गांधीपुरा में एक जनरल स्टोर चलाता है।

हरेंद्र खंडेल (दाएं)
कठिनाई को अवसर में बदलना
महामारी (कोविड-19) ने एक महत्वपूर्ण मोड़ दिया। हरेंद्र ने तीन साल के लिए 75,000 रुपये में कृषि भूमि पट्टे पर ली, मटर की खेती की और फसल से 3,50,000 रुपये कमाए। अपनी बचत से उन्होंने गांधीपुरा में एक छोटी सी दुकान खोली और अपने भाई की कॉलेज की शिक्षा का खर्च उठाया। वे धीरे-धीरे भूमि मालिक बन गए, जिसकी शुरुआत उन्होंने एक स्थानीय किसान से गिरवी रखी भूमि पर खेती करके की थी, और अपने कृषि व्यवसाय का विस्तार किया। दालों और सरसों या गेहूं की दो वार्षिक फसलें अब उन्हें सालाना लगभग 1 लाख रुपये की आय देती हैं, जिससे उनके परिवार का भविष्य सुरक्षित हो गया है।
समाज को वापस योगदान देना और प्रेरित करना
जैसे-जैसे उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत हुई, हरेंद्र ने ग्रामीणों को जाति प्रमाण पत्र, राशन कार्ड और आधार कार्ड जैसे आवश्यक दस्तावेज बनवाने में सहायता करना शुरू किया, जिसने उन्हें सामुदायिक मुद्दों से जोड़ा। वे अब स्थानीय सामाजिक संगठनों के साथ काम करते हैं, और हाल ही में अपने गाँव के लोगों को सशक्त बनाने में मदद करने के लिए एक कम्युनिटी वर्कर के रूप में जेनिथ (Zenith) से जुड़े हैं।

जनजातीय कल्याण विभाग में रामलखन (दाएं) के साथ हरेंद्र (बाएं)
साल 2024 की गर्मियों में, उन्होंने पूरी तरह से अपनी बचत के दम पर कजली आदिवासी के साथ विवाह किया। कभी दूसरों के घर बनाने का काम करने वाले हरेंद्र, आज अपने परिवार के लिए एक नया घर बना रहे हैं और अब अपने भाई के लिए भी एक सुंदर विवाह आयोजित करने का सपना देखते हैं।
हरेंद्र का जीवन कठिनाइयों के बीच एक लंबा सफर रहा है। लेकिन निराशा के हर क्षण में, उन्होंने दृढ़ संकल्प, अनुशासन और अपने परिवार के भविष्य को चुना। उन्होंने हर चुनौती का जवाब कड़ी मेहनत से दिया। उन्होंने कभी भी गरीबी या भाग्य को खुद पर हावी नहीं होने दिया।
हरेंद्र का जीवन दर्शाता है कि सफलता दृढ़ संकल्प, अनुशासन और कड़ी मेहनत से अर्जित की जाती है। उनका संदेश सरल लेकिन प्रभावशाली है:
"जीवन चाहे कितना भी कठिन क्यों न हो जाए, यदि आप ईमानदारी और साहस के साथ आगे बढ़ते हैं, तो कोई भी लक्ष्य पहुंच से बाहर नहीं है। कभी हार मत मानो; संघर्ष ही सफलता का पहला कदम है।"





