हमारा उद्देश्य
हम क्यों अस्तित्व में हैं और हम क्या बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
चक्र ख़ुद नहीं टूटते
हम मानते हैं कि यदि सहारिया समुदाय एक ऐसे चक्र में फंसा है, जहाँ सरकार , समाज और बाज़ार की शक्तियाँ मिलकर उसे पीढ़ी दर पीढ़ी और गहराई में धकेल रही हैं, तो समाधान इस चक्र तोड़कर और बदलकर एक नया चक्र बनाने में है।
स्वशासन और न्याय की राह का भविष्य
यह भविष्य तब ही संभव होगा जब सहरिया समाज में - आतंरिक चेतना की जाग्रति होगी, संगठनात्मक शक्ति और न्याय के लिए पूरी ताकत लगायी जाएगी। वर्तमान व्यवस्था पुराने चक्रों को बनाये रखना चाहती है। इसे तोड़ने के लिए, सहरिया समुदाय को इन ताकतों को चुनौती देना होगा- इन ताकतों से संबंध के मायने बदलने होंगे। एक समुदाय आधारित नेतृत्व में बहुआयामी नजरिया ही आगे का मार्ग है
स्वयत्तता (agency/ ताक़त/ स्वयं की बनायी हुई दिशा)
यदि पुराना चक्र सहरिया समुदाय को उनके अधिकारों से वंचित कर उन्हें व्यवस्थित रूप से शक्तिहीन/बेसहारा कर रहा है, उनके सामूहिक, संगठनात्मक प्रयासों की क्षमता को निष्क्रिय कर रहा है और उन्हें एक ऐसी भ्रष्ट व्यवस्था में धकेल रहा है जहाँ वे किसी भी स्थिति में हारने के लिए मजबूर होते रहें .....
.... तब, एक नया चक्र व्यवस्थित रूप से उन्हें सशक्त करे ताकि वह दूसरों के निर्णय में एक वस्तु मात्र से बदलकर अपनी खुद की कहानी के लेखक बन सकें और खोई हुई स्वयत्तता (एजेंसी) को फिर से हासिल कर अपनी अनोखी दृष्टि, समझदारी और आकांक्षाओं के आधार पर अपने भविष्य को स्वयं गढ़/ /बनाबुन सके।

जहाँ सहरिया अपना निर्णय स्वयं लें।
गरिमा
अगर पुराना चक्र सहरिया समुदाय की गरिमा को लगातार नीचे गिराता रहा है, उन्हें संवैधानिक अधिकारों वाले नागरिकों से वोट-बैंक की राजनीति के निष्क्रिय लाभार्थी तक सिमित करता है, और उन्हें शोषण के शिकार के रूप में परिवर्तित करता है - जहां उनकी कीमत सिर्फ़ उनके मजदूर होने की हैसियत से आंकी जाती है न कि उनकी मानवीय मूल्यों से, और जहां उनका दर्द अध्ययन सामग्री बन जाती है, जिससे कोई बदलाव नहीं आता….
तब एक नया चक्र स्थापित करना होगा जो उनकी पूरी नागरिकता को मान्यता देकर उनकी गरिमा को पुनर्स्थापित करे, उनके संवैधानिक अधिकारों को वास्तविक अनुभव बनाए न कि खोखला वादा, और ऐसी परिस्थितियाँ बनाए जहाँ उन्हें केवल उत्पादन के लिए नहीं बल्कि उनके अस्तित्व के लिए सम्मान मिले, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाए और उनकी भागीदारी उनके जीवन से जुड़े निर्णयों को प्रभावित करे।

जहाँ उनकी आवाज का महत्त्व हो ….
पहचान
यदि पुराना चक्र जल, जंगल, ज़मीन से उनके संबंधों को तोड़कर उनकी आदिवासी अस्मिता को व्यवस्थित तरीके से मिटा रहा है, उनकी परंपरागत जीवन शैली को विस्थापित कर रहा है, उनके सांस्कृतिक मूल्यों को विलुप्ति की तरफ धकेल रहा है ....
……..तो एक नये चक्र को व्यवस्थित तरीके से उनकी सास्कृतिक पहचान को संरक्षित और सशक्त करे जो उन्हें उनकी जड़ों से जोड़े, उनके परंपरागत ज्ञान का सम्मान करे, और वह अवसर भी दे जहाँ उनकी आदिवासियत को एक जीती-जागती समझ के रूप में स्वीकार किया जाए और उसका उत्सव मनाया जाए जो हमारी सामूहिक विरासत को बेहतर बनाये ।

जहाँ उनकी सरल जीवन शैली का सम्मान हो।
जीवन का अर्थ
यदि पुराना चक्र व्यवस्थित तरीके से सहरिया समाज के महत्व को ख़त्म कर देता है, भाग्य-नियति के नियम को जबरदस्ती लागू करता है, जहाँ “कभी कुछ नहीं बदलता”, बदलाव की संभावना में विश्वास को खत्म करता है, और किसी भी अर्थपूर्ण बदलाव की समझ को दरकिनार करता है – तब यह स्थिति उन्हें एक ऐसी कहानी में फंसाकर छोड़ देती है जहां जीवन की उम्मीद - एक झूठ और तर्कहीन बन जाती है और निराशा ही उनकी एकमात्र असलियत रह जाती है...
तब एक नया चक्र व्यवस्थित रूप से नए अर्थ नए उद्देश्य का निर्माण करे, छोटी-छोटी सफलताओं को इस तरह प्रस्तुत करें कि वे जीते-जागते प्रमाण बन जाएँ कि बदलाव संभव है; ऐसी कहानियां बनायें जिसमें सहरिया समुदाय की स्वयत्तता(एजेंसी) की क्षमता और स्पष्ट रूप से दिखाई दे और उसका उत्सव मनाया जाये, और ऐसे स्थान (स्पेस) का निर्माण करना जहाँ विकल्प सिर्फ सोच में नहीं, बल्कि व्यवहार में भी उतर सके - जहां पर ये शब्द कि “कभी कुछ हुआ ही नहीं” हमेशा के लिए बदल कर यह हो जाये कि “हमने इसे कर दिखाया”, और जहाँ उम्मीदें न केवल भावनाएं बल्कि सामूहिक कार्यवाही का रणनीतिक संसाधन बन जाये।

जहाँ वे गर्व से खड़े हैं।
हमारा आस्तित्व क्यों है?
सहर का मकसद सहरिया समुदाय को , स्वशासन और न्याय की नींव पर बने भविष्य का निर्माण करने में मदद करना है।

सहर सहरिया सुमदाय को 'प्रतिक्रिया-चक्र' (counter-cycle) बनाने में मदद करेगा, वह एक ऊपर जाने वाला चक्र होगा जो सहरिया लोगों को आत्मनिर्भरता, स्वशासन और न्याय की ओर ले जायेगा। जहाँ उनका हर कार्य उनकी गरिमा को और मजबूत करेगा , उनके द्वारा बनाया गया हर ढांचा उनकी एजेंसी को फिर से स्थापित करेगा , उनका हर ढांचा (व्यवस्था) उन्हें अपने स्वतंन्त्र रूप से काम करने की आज़ादी को बहाल करेगा, हर कहानी उनकी मुक्ति के लिए उन्हें जागरूक करेगी और यह सब ज्यादा संभव और वास्तविक होगा।
सहर में हमें केवल अलग-थलग पलों में हस्तक्षेप से कहीं ज्यादा करना होगा। हमारा अस्तित्व, व्यवस्था की खामियों को ठीक करने या व्यवस्था तंत्र का इलाज करना नहीं है, बल्कि उसे परिवर्तित करने के लिए है।
पहचान को पुन: वापस लेना (पुन: प्राप्ति): सहरिया समुदाय की 'आदिवासियत' यानि उनकी सांस्कृतिक पहचान, ऐतिहासिक यादगारों और पारिस्थितिक ज्ञान की रक्षा करना, उसे संवारना और उसे सुरक्षित बनाये रखना; और विशेष रूप से 'जल, जंगल और ज़मीन' के साथ उनके उस पवित्र रिश्ते को सहेजना, जो उनके आस्तित्व का आधार है।
गरिमा पुनः स्थापित करना : यह सुनिश्चित करना - कि कानूनी सशक्तिकरण, सामुदायिक संगठन और सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव के माध्यम से उनके अधिकार सिर्फ कानूनों में ही न लिखे हों, बल्कि वे एक जीवित सच सच्च्चाई बनें।
एजेंसी का पुनर्निर्माण: अपनी विशेष वैश्विक दृष्टि, उम्मीदों के अनुसार अपने भविष्य की सोच को विकसित करने, उसे साकार करने, उसके लिए निर्णय लेने और भविष्य को आकार देने के लिए नेतृत्व तैयार करना, एकजुटता के नेटवर्क को तैयार करना, और सामूहिक क्षमता को सशक्त बनाना
अर्थों/उद्देश्य का नवीनीकरण: ऐसी जगह बनाना जहाँ विकल्पों को सोचा जा सके,उनकी कल्पना की जा सके और उन्हें साकार किया जा सके; जहाँ छोटी-छोटी जीतें संभावनाओं का जीवंत प्रमाण बने; और जहाँ परिवर्तन लाने के लिए - भाग्य-नियति की जगह पर अपनी शक्ति में एक गहरा विश्वास पैदा हो।




