हमारा तरीका

सामुदायिक नेतृत्व वाले बदलाव के प्रति हमारे दृष्टिकोण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत।




सहर में, हम जिन समस्याओं का निदान  करने पर काम कर  रहे हैं और जिन कारणों के लिए हम यहां हैं, उसे पूर्ण करने के लिए हमें एक  अलग  तरीके से सामने आना होगा, एक  नजरिया अपनाना होगा और कुछ  अलग सिद्धांतों के साथ काम करना होगा। 

हाशिये पर ले जाने वाले चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए यह ज़रूरी है कि हम खुद सचेत रहें, ताकि अनजाने में अपने कामों से उन्हीं चक्रव्यूहो को और मजबूत न कर दें। इसलिए यह समझना बेहद जरुरी है कि हम कैसे काम कर रहे हैं और कैसा काम नहीं कर रहे हैं – यहां हम किस काम के लिए हैं और किस काम के लिए नहीं हैं।  

याद रखने के लिए  कुछ सिद्धांत नीचे दिए गए हैं : 

सहरिया को मुक्तिदाता-मसीहा की जरूरत नहीं है 

मुक्तिदाता-मसीहा बनने का लालच/ललक  इस काम में सबसे खतरनाक संभावना है: यानि यह मान लेना कि जिस समुदाय के साथ हम काम कर रहे हैं उन्हें बचाने के लिए एक समुदाय से बाहर के नेता  की जरूरत है। यह सोच अंत में उन्हीं शक्तियों के  को takatva करती हैं जिन्हें हम ठीक करना चाहते है 

हमारा काम सहरिया लोगों के लिए आंदोलन खड़ा करना, उसे चलाना या थोपना नहीं है।  हमारा काम उन्हें सशक्त बनाना और उनको अपना आंदोलन खुद बनाने-चलाने में मदद करना है। जेनिथ में, हमारा मानना ​​है कि परिवर्तन समुदाय के अंदर से ही आना चाहिए, वे ही अपनी कहानी के मुख्य पात्र हैं, हीरो हैं। 

हम सहरिया समुदाय की तरफ से नहीं बोल रहे हैं। सहरिया समुदाय के लोग ही अपने समुदाय  के लिए बोल रहे हैं। हम उनकी लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। वे अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़ रहे हैं।

हम सिर्फ उन्हें वह तरीका, कौशल, ज्ञान, जागरूकता, स्पष्टता और सहयोग करते हैं जिसकी उन्हें जरूरत है, ताकि वे स्वयं खड़े हो और आत्मनिर्भर होकर अपने भविष्य को खुद तय कर सकें – जो उनके अपने ज्ञान, दुनिया को देखने के  नजरिया और उम्मीदों पर आधारित हो – न कि हमारे। 

हमारे काम करने के तरीके में  एक बुनियादी अंतर है। हम उनके आगे नहीं, बल्कि पीछे खड़े हैं। हम सहयोगी की तरह काम करते हैं, न कि मुक्तिदाता या मसीहा की तरह; और सहरिया समुदाय में इस तरह के नेतृत्व नेत्रित्व को सहयोग देने के लिए हम खुद को जिम्मेदार ठहराते है ताकि उनके संघर्ष को छीने बिना हम उनकी आवाज को बुलंद करें। 

हम इन चक्रों को तोड़ते हैं, इसे कायम नहीं रखते 

सामाजिक विकास के क्षेत्र में बहुत सारे संगठन-संस्था ज्यादातर तात्कालिक राहत दिलाने में अल्प कालिक, छोटे समाधान देते हैं, इस तरह के हस्तक्षेप से समुदाय को कुछ समय के लिए राहत मिल सकती है। 

इस स्थिति को भी हम समझते हैं और ये हमारे लिए काफी मुश्किल और नैतिक रूप से चुनौतीपूर्ण है कि जिन लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए हम जुड़े हैं उन्हें प्राथमिकता ना दें – चाहे निजी तौर पर हो या भावनात्मक स्तर पर, उनके हित में निवेश करना स्वाभाविक है।

लेकिन इस तरह के तरीके और तात्कालिक राहतें अक्सर अंत में हमारे ऊपर उनकी निर्भरता को और बढ़ा देते है। इस तरह हम उनके पुराने चक्र में, एक और ताकत बन जाते हैं क्योंकि यह सहरिया समुदाय के लोगों को निर्भरता के उस चक्र से जकड़े रखती है। 

यहां पर हम ज़ुल्म और निर्भरता के चक्र की गति को धीमा करने के लिए नहीं हैं, हम चक्र को तोड़ने में मदद करने के लिए हैं।

और हमारे अंदर इतनी नैतिक हिम्मत होनी चाहिए कि हम बड़ी तस्वीर देख सकें और यह समझ सकें कि हमारे छोटे से छोटे काम से उनकी स्थायी या दीर्घकालिक कल्याण पर क्या असर पड़ता है।  

हमारा कार्यसरकार , समाज या बाज़ार बनना नहीं है

स्वभावत:, व्यवस्था में बहुत बड़ा खोखलापन है जहाँ कोई भी ताकत अपना काम सही से नहीं कर रही है, इसका अर्थ यह है कि जो भी जरुरी काम हैं वे नहीं हो रहे हैं। इससे एक तरीक़े की सेवा प्रदान करने, योजनाओं तक पहुँच बनाने और रोजगार दिलवाने की मदद करने का लालच/आकांशा विकसित होता है; लेकिन ऐसा करने से हम अनजाने में ही सरकार, बाजार और समाज का कार्य करने लगते हैं। 

यह हानिकारक है क्योंकि इसका परिणाम यह निकलता है कि व्यवस्था और तंत्र फिर अपना काम नहीं करेंगे  और अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हट जाएँगे । 

हम यहां सरकार, बाज़ार या समाज का काम करने के लिए नहीं हैं, यहां हम अपना काम करने के लिए हैं। 

हमारा काम क्या है? हमारा काम सूत्राधार का है, सुगमता देने का हैसेवाएं देना नहीं है। हमारी जिम्मेदारी सुदृढ़ और व्यवस्थित तरीके से समुदाय की क्षमता का निर्माण करना और उनके संगठित होने के लिए कार्य करना है, ताकि वे स्वयं अपनी पैरवी और नेतृत्व  कर सकें; हमारा काम ऐसा मंच तैयार करना है जहाँ सहरिया समुदाय एकत्र हो सके, अपना अनुभव साझा कर सके और सामूहिक उद्देश्य के लिए एकजुट हो सकें। एक ऐसा आन्दोलन तैयार करना जो आदिवासी आन्दोलन के बारे में आदिवासी पहचान की रिवायत (कहानी) को बदल सके। बदलाव के लिए उन परिस्थतियों का निर्माण करना है जहाँ भविष्य में सहरिया अपनी शर्तों पर जी सकें, अपना भविष्य ख़ुद चुन सकें। 

हम व्यवस्था के भीतर से काम करते हैं, न कि बाहर से - ये तंत्र हमारे दुश्मन नहीं। 

सामाजिक संगठन अक्सर सरकार , बाज़ार और समाज को दुश्मन या शोषक  के तौर पर देखने और उन्हें हराने का इरादा रखते है। शत्रुता का यह व्यवहार सही राह तो लग सकती  है, लेकिन यह अक्सर अकेलेपन की तरफ ले जाती है, न कि बदलाव की तरफ। 

यदि हम वास्तव में एक रचनात्मक व्यवस्था बनाना चाहते हैं जो सहरिया समुदाय को स्वतंत्र करे, उनकी (एजेंसी) का फिर से निर्माण करे, उनकी पहचान को फिर से स्थापित करे, तो यह कोई ऐसा काम नहीं है जिसे जेनिथ या सहरिया समुदाय अकेले अपने दम पर नहीं कर सकते। हम सब समाज का एक हिस्सा हैं, हम बाज़ार का भी हिस्सा हैं; हम सब व्यवस्था के भीतर रहकर काम कर रहे हैं, न कि किसी बाहरी ताकत के रूप में।   

यदि हम वास्तव में सहरिया समुदाय के लिए रचनात्मक व्यवस्था को सुगम बनाने के प्रति गंभीर हैं तो हमें उन संस्थाओं-सिस्टम के साथ जुड़ना होगा। एक असहाय व्यक्ति की तरह  नहीं, बल्कि जवाबी नीतियों, आचरण और सहरिया समुदाय को विकास की प्रक्रिया में जोड़ने के तौर-तरीके में एक सहभागी बनकर कार्य करना होगा। उन्हें हम दुश्मन या जन्मजात दुष्ट के रूप में नहीं मान सकते। वे सामाजिक व्यवस्था का ज़रूरी हिस्सा हैं और ऐसे किरदार हैं जिन्हें हम ख़ारिज नहीं कर सकते, नयी व्यवस्था बनाने में उनकी जरूरत पड़ेगी। सहरिया समुदाय के साथ इन किरदारों का संबंध है, उस संबंध के मायने बदलने की जरूरत है। 

हम आने वाले कल/समय के लिए समाधान निकाल रहे हैं, न कि सिर्फ़ आज के लिए

ज़्यादातर क्या होता है कि हम  अपने काम की गुणवत्ता इससे नापते हैं कि काम कितना ज़्यादा हुआ, कितने लोगों तक हम पहुँच पाये या हमे कितने लोगों का भला किया और इस काम को करने के लिए अलग अलग प्रलोभन, लालच भी हैं लेकिन हमें थोड़ा गहरा और गहन काम करना है और ये देखना है कि क्या हमारे काम से सहरिया समाज की ताक़त में क्या बदलाव हुआ और क्या संभावनाएं खुली हमारे काम से?

जेनिथ में हम, आन्दोलन को सुगम बनाने के लिए हैं - हम एक ऐसा बदलाव लाना चाहते हैं जो टिकाऊ हो और इन समस्यायों को हमेशा के लिए ख़त्म कर दे। बार-बार आधे-अधूरे समाधान के बजाय गंभीर, ढांचागत और व्यवस्थागत तरीके से समाधान निकालने के लिए हैं। समस्या को सुलझाने के लिए हम हमेशा गहराई और गंभीरता के साथ आगे बढ़ेगें। 

सहरिया समुदाय की इस पीढ़ी के लिए हम उतना ही जिम्मेदार हैं जितना भविष्य की पीढ़ियों के लिए। 

हमें पीढ़ियों के हिसाब से सोचना चाहिए, न कि वर्षों और दशकों के हिसाब से। 

हमें हाल की / वर्तमान की  ज़रूरतों को हासिल करने और लंबे समय के व्यवस्था-ढांचे को बदलने के काम   के बीच संतुलन बनाने में सक्षम होना चाहिए। हमें तात्कालिक कार्यवाहियों को दीर्घकालिक नजरिये के साथ जोड़ने के तरीके खोजने होंगे -  यह सुनिश्चित करते हुए कि हम जो भी कदम उठाएं, वह तात्कालिक राहत के बजाय स्थायी बदलाव में सहयोगी हो। हमें किसी बीमारी या घाव को ऊपर-ऊपर से मरहम-पट्टी एनएच करना है बल्कि उसको जड़ से ख़त्म करना है।

हमारे हस्तक्षेप का प्रत्येक प्रारूप एक सरल और जरुरी परिक्षण से गुजरना चाहिए: क्या हमारा काम हाशिए पर धकेले जाने के चक्र को तोड़ने में योगदान करेगा या लोगों को सिर्फ़ थोड़ा और सहनशील बना देगा? हम सुधार के आसान तरीकों के बजाय, बदलाव के कठिन रास्ते को चुनते हैं; भले ही यह तरीका अल्पकाल में तकलीफ दायक क्यों न हो।  

काम करने का कोई सीधा रास्ता नहीं है; हम कई अलग-नए-अनोखे तरीकों से काम करते हैं 

परिवर्तन की यात्रा में कोई भी एक मात्र तरीका नहीं होता, कोई एक मात्र समाधान नहीं होता, कोई तय विधि नहीं होती और न ही कोई सीधा रास्ता होता है। जिन मुद्दों पर हम काम कर रहे हैं, वे प्याज/कान्दा की तरह परत-दर-परत है, ऐतिहासिक है और काफी गहराई तक व्यवस्था और सोच में जमी हुई है। इनके लिए अलग-अलग समय पर अलग-अलग साधनों की ज़रूरत होती है। 

हम किसी एक तरीके से बंधे नहीं हैं, हम अपने उद्देश्य के प्रति समर्पित हैं। 

महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे सभी प्रयास एक बड़े उद्देश्य को पूरा करे : दुष्चक्र को तोड़कर सहरिया समुदाय की गरिमा, नेतृत्व और आत्म-निर्णय को पुनर्स्थापित करना।

हमें समावेशी बने रहना चाहिए, समुदाय की बात हमेशा सुननी चाहिए और संदर्भ के हिसाब से रणनीति की दिशा तय होनी चाहिए। 

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© जेनिथ सोसाइटी फॉर सोशियो-लीगल एम्पावरमेंट।