समस्या

सहरिया समुदाय जिन संकटों का सामना कर रहा है और जो हमारे काम को आवश्यक बनाते हैं


सरकार  समाज और बाजार की ताकतों द्वारा कमजोर बनाये जाने की वजह से सहरिया समुदाय एक ऐसे चक्र में फंस गया है जहाँ से वो निकल नहीं पा रहे है , और  ये  स्थिति उन्हें  लगातार और भी किनारे की तरफ धकेल रही है। अपनी जमीनों से बेदखल होकर, गरिमा  और अधिकारों से वंचित , वे अपनी पहचान, अपने आस्तित्व – यहाँ तक कि स्मृति  से मिट जाने की कगार पर खड़े है।  

सहरिया: जंगल के लोग

सहरिया आदिवासी समुदाय, एक अर्ध-घुमंतू जनजाति है जो कि मुख्यता मध्य प्रदेश और राजस्थान के गिर्द, चंबल के सूखे जंगलों में रहते हुए आयें हैं।

सदियों से, सहरिया समुदाय का जंगल के साथ एक गहरा संबंध रहा  है। यह उनके आजीविका का  स्रोत रहा है और यही उनके ज्ञान, उनके रीतिरिवाज और उनकी बुद्धिमता का भी स्रोत है – परन्तु, शायद किसी भी चीज से बढ़ कर यह उनकी पहचान रही  है।  

सहरिया समुदाय के लिए “जल जंगल जमीन” एक नारे से बढ़ कर उनके आदिवासी पहचान का सारांश है।

अन्याय का इतिहास

इतिहास में हुये परिवर्तनों ने व्यवस्थित रूप से धीरे-धीरे सहरिया समुदाय की  पारंपरिक जीवन शैली को नष्ट कर दिया। 

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान, जंगल को राज्य की संपत्ति घोषित कर दिया गया था। जिसका परिणाम यह हुआ कि, आदिवासी जो कि जंगल के संरक्षक थे, उन्हें जंगल का विनाश करने वाला माना जाने लगा। वैज्ञानिक पद्धति (scientific forestry) से वनों की सुरक्षा के नाम पर उनकी आत्मनिर्भरता छीन ली गई और उनकी उपस्थिति को अपराधिक घोषित कर दिया गया। उन्होंने न केवल अपनी जमीनें खोयी, बल्कि  व अपने मौलिक अधिकार भी खो दिए जिससे उनका रहना ही ग़ैर कानूनी हो गया।

आज़ादी के साथ संवैधनिक सुरक्षा और कल्याणकारी नीतियों  के वादे आये। परन्तु अंग्रेज़ों की सोच सरकार की  नीतियाँ में तब्दील हो गई। वन अधिकारों को कमज़ोर किया गया, समुदाय को विस्थापित किया गया और उनकी जीवन शैली को जड़ से ख़त्म कर दिया गया।

समय के साथ सहरिया समुदाय को स्थायी कृषि की तरफ धकेल दिया गया। लेकिन मुख्यधारा की कृषि व्यवस्था  में  उनके साथ  अत्यंत गंभीर भेदभाव, शोषण और हिंसा हुआ।  वे जमीदारों, साहूकारों और स्थानीय उच्च वर्ग के गुलाम बन गए। जीवित रहने के लिए उन्होंने अपनी आजादी और मान सम्मान भीखो दीया।    

शिवपुरी का नया बलारपुर बंजर पथरीली  जमीन पर खड़ा है। वह झील जो कभी जीवन देती थी, वह अब नहीं है, पानी सूख गया, बिलकुल उनकी आशाओं की तरह। वे असहाय देखते रह जाते हैं - विस्थापित,, और अब पानी तक से वंचित हैं।

एक चक्र जिसमें से बाहर निकालना संभव नहीं 

सहरिया समुदाय के लोगों के साथ हुआ अन्याय अलग-अलग घटनाओं का परिणाम नहीं है। यह  परस्पर एक दुसरे से जुडी ताकतों का जाल है जो एक दुसरे को पोषित करती हैं: सरकार  की उदासीनता , बाजार के द्वारा किया गया शोषण और समाज के द्वारा किया गया बहिष्कार।

  • सरकार  सशक्तिकरण का वादा करती  है , लेकिन नियंत्रण के माध्यम से कार्य करती  है। यह सहरिया समुदाय को उनके जल, जंगल और जमीन से अलग कर देती है और इनकी नागरिकता के अधिकार को वोट बैंक की राजनीती के निष्क्रिय लाभार्थी तक सीमित कर देती  है। न्याय सुनिश्चित करने के लिए बनायीं गयी क़ानूनी व्यवस्था, जो उनकी सुरक्षा और विकास की जिम्मेदार है वो व्यवस्था स्वयं ही सहरिया को अमानवीय रूप से देखती है। 

  • बाजार अवसर-मौके-नौकरी  का भ्रम पैदा करता है पर उनकी एजेंसी (स्वयत्तता) छीन लेता है। यह उनको कर्ज के जाल, पूरे दिन-रात कठोर काम  और अनुचित-शोषण वाली मजदूरी वाली व्यवस्था में ढकेल देता है। यह उनके पारंपरिक ज्ञान के मूल्य को नहीं देखता है, मात्र उनकी सस्ती मजदूरी  को देखता है। यह एक ऐसी व्यवस्था है जिसमे वे जितना ज्यादा शामिल होते हैं उतना ही ज्यादा खोते चले जाते है,और शोषण का शिकार बनते जाते हैं 

  • समाज को समझना सबसे मुश्किल है और उसके प्रकोप से बचना उससे भी ज़्यादा मुश्किल। समाज उन्हें सामंती जातिगत उंच-नीच में बांध देता है और उनके लिए विद्यालय और स्वास्थ्य सेवाएं बंद कर देता  है;  कानून से नहीं, नजरिये से।  हिंसा से नहीं, दूरियां बनाकर।  

जंगलों  के संरक्षक की भूमिका से खदानों में गुलाम मजदूर बनने तक की यात्रा में, सहरिया लोगों से उनकी जमीन, गरिमा और जीवन छीन लिया गया। शिवपुरी का एक वृद्ध, जिसे पत्थर खदान में श्रम के लिए मजबूर किया गया, धुल से भरे फेफड़े के साथ अंतिम साँस लेते हुए . उस एक व्यक्ति का दर्द पुरे समुदाय के संघर्ष और नुकसान का प्रतीक है। 

सहरिया किनकी ओर देखें ?

जब वे अपनी जमीनों के लिए संघर्ष करते हैं, तो कानून व्यवस्था उनके विरोध में खड़ा हो जाती  है। जब उनके बच्चे शिक्षा चाहते है तो विद्यालय अपने दरवाजे बंद कर लेते हैं। मजबूर होकर वे चिलचिलाती धुप में मजदूरी करते हैं, किसी तरह जिंदा भर रह पाये बस उतना कमा पातें हैं। सभी सरकारी योजनाओं की लिस्ट में इनका नाम जोड़ लिया जाता है, हर बाहरी व्यक्ति, संस्थाएं  उनके दुखों का अध्यन करता है – इनकी भावनाओं और कहानियों को उनसे चुरा लिया जाता है। वे कहते है: “हम यह सब पहले ही सुन चुके हैं” और “कभी कुछ नहीं बदलता”।

एक टूटा-बिखरा हुआ समुदाय इन चक्रों  से बाहर कैसे निकलेगा ? कहाँ से वे इसकी शुरुआत करेंगे ?

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© जेनिथ सोसाइटी फॉर सोशियो-लीगल एम्पावरमेंट।